वसुंधरा दिवस पर धरती की पुकार
के दोहे
शुष्क
हुई है अब धरा, बढ़ा सूर्य का ताप।
सागर से उठने
लगी, धीरे-धीरे भाप।।
तपकर
भी धरती कभी, रुष्ट न होती मित्र।
पाते ही
दो बूँद जल,
बिखरा देती इत्र।।
धरा
कभी थकती नहीं, सूर्य न ले विश्राम।
मात-पिता
सम दें हमें, दोनों ही आराम।।
जिसने
सपने सच किये, चुने राह के शूल।
पावन
लगती है सदा, उस वसुधा की धूल।।
वृक्ष
लगा अब तो मनुज, वरना होती हार।
जीवित
बहुत रहता नहीं, सतत पड़ा बीमार।।
नित्य
प्रदूषण जहर बन, चले दाँव पर दाँव।
तब
कैसे शीतल करे, मन वसुधा पर छाँव।।
कोई
सुधि लेता नहीं, छीन रहे सब मान।
धरती
पर इंसान भी, आज बना है श्वान।।
बर्फ
पिघलती जा रही, सूख रहे हैं
ताल।
अपना
ही मुख तक रहा, धरती तल कंगाल।।
फटती
धरती कर रही, हर दिन ही फ़रियाद।
करो
प्रदूषण से मुझे, मानव अब आज़ाद।।
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अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
