कह-मुकरियाँ 1


 



हंस वेग की है बलिहारी।
मनभावन छवि लगती प्यारी।
उसपर करती हरदम नाज।
ऐ सखि साजन ? नहीं जहाज ।।1
 
उसको देख हिया हर्षाता।
जोड़ा अद्भुत प्रभु ने नाता।
करूँ उसी पर न्यौछावर जाँ।
ऐ सखी साजन ? ना सखी माँ ।।2
 
आकर गाकर प्यार जताए।
सबके सम्मुख नहीं सुहाए।
रहती हूँ सखि उससे बचकर।
ऐ सखि साजन ? ना सखि मच्छर ।।3
 
दिन होते ही आँखे फेरें।
रात अँधेरे आकर घेरें।
उनके ढँग सखि भाते सारे।
ऐ सखि साजन ? ना सखि तारे ।।4
 
महका आँगन जब वह आया।
देख खिला तन मन मुस्काया।
री सखी  बैठी  सुध-बुध भूल।
क्या सखि साजन ? ना सखी फूल ।।5
 
गुनगुन करता गीत सुनाए।
आए सम्मुख हिय धड़काए।
रहता है सखि दिनभर सँवरा।
ऐ सखि साजन ? ना सखि भँवरा ।।6
 
 जोड़ा प्रभु ने ऐसा नाता।
बिन उसके कुछ नहीं सुहाता।
लगता जीवन बेईमानी।
ऐ सखि साजन ? ना सखि पानी ।।7
 
मान मिला है उसको पाकर।
बदला मुझको उसने आकर।
समझ न उसको  ऐसा-वैसा।
ऐ सखि साजन ? ना सखि पैसा ।।8
 
उसके कारण मैं सज जाती।
बिन उसके मैं रह ना पाती।
आँसू पोंछे जब मैं रोती।
ऐ सखि साजन ? ना सखि धोती ।।9
 
श्याम रंग उसका अति भाए।
रीखुलकर वह साथ निभाए।
बारिश गर्मी सँग-सँग आता।
ऐ सखि साजन ? ना सखि छाता ।।10
 
उसका आना मन को भाए।
आते ही सुध-बुध बिसराए।
जकडे जब-तब वह  बेदर्दी।
ऐ सखि साजन ? ना सखि सर्दी ।।11

#
~ अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र'

 

 


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