आम नीम मधुमालती, गुलमोहर के फूल।
करते गर्म बयार का, अहं पलों में धूल।।
पगडंडी वीरान है, बिलख रहा है गाँव।
धूप हुई है तीव्र अब, और लुप्त है छाँव।।
अरुण रश्मियाँ चुभ रहीं, बनकर दाहक तीर।
बरसो घन मेरे नगर, समझ जनों की पीर।।
बुझ न सकेगी प्यास तब, बैठ किसी भी तीर।
होगा नदियों ताल में, सागर-सा गर नीर।।
सिलवट-सिलवट कह रही, काट
रही है सेज।
रातें भी मुरझा रहीं, धूप हुई है तेज।।
कोस-कोस पानी नहीं, सूखे सरिता तीर।
कृषकों की गति देखकर, मन हो गया
अधीर।।
मुरझाए अमरूद से, बोले हँसकर आम।
ग्रीष्म तपाता है मगर, लाता शुभ परिणाम।।
सूख रहे तालाब अब, नदियाँ हैं बेहाल।
पनिहारिन व्याकुल हुई, करती बैठ मलाल।।
बढ़ी देश में उष्णता, होती नित विकराल।
पानी रखो सहेजकर, वरना खड़ा अकाल।।
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अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
