सर
पोखर सूखे सभी, करती नदी
विलाप।
शीतकाल
बीता नहीं, नीर
उड़ा बन
भाप।।
दिनभर होता आजकल, गरमी का अहसास।
नींबू-पानी
छाछ भी, नहीं
बुझाते प्यास।।
गरमी के अहसास से, व्याकुल
हैं सब ढोर।
कानन
भी उजड़े सभी, छाँव
खोजते
मोर।।
विकट धूप पड़ने
लगी, झुलस रहे हैं लोग।
उभर
रहे मनु चर्म पर, भाँति-भाँति के रोग।।
गरमी का अहसास भी, होता बहुत कमाल।
खूब लुभाते
हैं हमें, सागर, सरिता, ताल।।
दाना-पानी छाँव रख,
बुझा सभी की प्यास।
होता
है हर जीव को,
गरमी का अहसास।।
उस शासन से व्यर्थ है, पानी की भी आस।
कैसे भी बुझती नहीं, जिसकी अनकथ प्यास।।
छतरी गमछे टोपियाँ, बने हुए हैं ढाल।
फिर भी है सारा बदन,
गरमी से बेहाल।।
किस मछली ने लील
ली,
इस धरती की छाँव।
जल-जल कर जलजीव सा, भटके सारा गाँव।।
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~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
