आयी पर्वत लाँघकर, ज्यों फागुन की धूप।
बौराया हर कामशर, निखरा वसुधा रूप।।
मन
कस्तूरी हो गया, ऐसी
चली बयार।
सुगबुग ने ऋतुराज की, खोले खिड़की द्वार।।
अँगड़ाई
लेने लगे, मन के
सुप्त प्रसंग।
छाये आज दिमाग पर, बन फागुन के रंग।।
रंग भरीं पिचकारियाँ, करने लगीं धमाल।
टेसू ने
भी रँग दिये, सबके कोरे गाल।।
जब होली ने खोल
दी, रंगों की टकसाल।
मधुकर रस लेते
दिखे, छू रंगीले गाल।।
बैराए हैं कामशर, लगे सूखने बेर।
सरसों भी पीली पकी, करो न साजन देर।।
फागुन जब
आगे बढ़ा, दिखे अनोखे रंग।
मन पलाश सा हो गया, ऐसे बढ़ी उमंग।।
सचमुच यह उतरे नहीं,घिस-घिस जाते अंग।
रगड़-रगड़ छूटे नहीं, चढ़ा प्रेम का रंग।।
होली उत्सव प्रेम का, कर दे तन-मन लाल।
हर दिल चाहे गोपियाँ, रँग दें आकर गाल।।
#
~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
