गौरी के चंचल नयन, खोजें मन का चैन।
अधमुन्दी पलकें लिए,फागुन की हर रैन।।1
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फागुन ने हौले लिखा, आँचल पर हर हाल।
इसी बहाने जड़ दिया, चुम्बन का इक जाल।।2
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फागुन की बहकी हवा, आयी लेकर प्रीत।
बस्ती-बस्ती गा रही, बंजारों से गीत।।3
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लाया है फागुन पुनः, सारे देसी रंग।
ढपली चिमटा ढोलकी, ताल मँजीरा
चंग।।4
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खोले मस्त बसंत ने, कलिकाओं के
बन्ध।
अमराई में छा गई, भीनी-भीनी गन्ध।।5
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चढ़ने लगा बसन्त का, जैसे-जैसे रंग।
खिलने लगे पलाश के, नित नव हर्षित अंग।।6
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चादर की सिलावट कहे, ओ परदेसी बाज़।
खोल न दे फागुन कहीं, तेरे मेरे राज़।।7
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पड़ा सजन के हाथ का, जब-जब तन पर रंग।
तब-तब तन पर चढ़ गये, लाखों लाख भुजंग।।8
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छाया था नभ पर जहाँ, उड़कर आज अबीर।
वहीं दिखी बढ़ती हुई, हर विरहन की पीर।।9
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कुहरे की चादर हटा, आया जब मधुमास।
लाया फागुन की ख़ुशी, रंगों का उल्लास।।10
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चादर पर हैं सिलवटें, गुमसुम पडा लिहाफ़।
फागुन को कैसे करे, विरहन का मन माफ़।।11
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अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
