कह-मुकरी

 

कह-मुकरी


पनघट से घर जाती सखियाँ


       कह-मुकरी’ चार पंक्तियों की एक पद्य रचना है। यह जब 16-16 मात्राओं पर होती है, तब यह  सम-मात्रिक छंद ‘पादाकुलक’ की चार पंक्तियों के समान होती हैं। इसमें दो-दो पंक्तियों के मध्य तुकांतता पायी जाती है। कह-मुकरी नाम होने के पीछे जो कारण है, वह किसी बात को कहना  और फिर मुकरना है।

          कह-मुकरी विधा का सर्वप्रथम परिचय प्राचीन कवि अमीर खुसरो के द्वारा 14वीं सदी में कराया गया था। उन्होंने कुछ उत्कृष्ट कह-मुकरियाँ कही हैं। उन्होंने इसे दो सहेलियों के मध्य की वार्ता के रूप में प्रस्तुत किया है। तत्पश्चात 1870-80 के दशक में भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा देशप्रेम और अंग्रेजी शासन के कुप्रभावों को उजागर करने के लिए कह-मुकरी कही गई है। उन्होंने ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ (1873) के माध्यम से इन्हें प्रकाशित भी किया है।

          इस विधा में मुख्यतः दो घनिष्ठ सहेलियों के मध्य की वार्ता है, जिसमें प्रथम सहेली कुछ बात कहती है। उसकी कही बात द्विअर्थी होती है उसका एक अर्थ वह अपने प्रियतम के लिए कह रही है और दूसरा अन्य किसी वस्तु आदि के लिए कह रही है। किन्तु जब दूसरी सहेली उससे पूछती है कि क्या वह यह बात अपने सजन या अपने प्रियतम के लिए कह रही है तब वह मुकर जाती है तथा किसी अन्य बात की ओर इशारा करती है। यह रचना एक पहेली की ही तरह है किन्तु इस वार्तालाप को देखें तो उसे पहेली कहना उचित प्रतीत नहीं होता है।

          यह विधा भारतेंदु के पश्चात के मध्य काल के कवियों के बीच अपना स्थान नहीं बना सकी और समय के साथ लुप्त हो गई थी। पिछले डेढ़ से दो दशक पहले इसे नव जीवन मिला और यह रचना फिर जीवंत हुई। यह कविता के मंचों पर तो स्थान नहीं बना सकी है किन्तु कवियों के मध्य इसने अपना स्थान बनाया है। यही कारण है कि पिछले दशक में कई कवियों के कह-मुकरी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। कुछ सम्मिलित कवियों के भी संकलन इस विधा पर प्रकाशित हुए हैं।  

~अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र'

कह-मुकरियाँ पढ़ने के लिए 'अन्य काव्य पृष्ठ' पर जाएँ  या नीचे दी गयी लिंक पर जाकर पढ़ें. 

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