कह-मुकरियाँ

 


नाक दबाए आँख छिपाए।
खींचे कानो को मन भाए।
कर दे रंग रँगीला पागल।
क्या सखि साजन ? ना सखि गागल ।।1
 
कभी साथ ना छोड़ा जाए।
और कभी बिलकुल ना भाए।
दिन-दिन बदले उसका रूप।
क्या सखि साजन ? ना सखि धूप ।।2
 
जब चूमें लब कर बेशर्मी।
मेरे तन को दे वह गर्मी।
जीभ निगोड़ी री जली जाय।
ऐ सखि साजन ? ना सखी चाय ।।3
 
मेरी लाज बचाए हरदम।
नहीं डील से भारी भरकम।
मेरे तन संग सहता पीर।
ऐ सखि साजन ? ना सखी चीर ।।4

इसकी  उसकी  खूब सुनाए।
सबकी यह इक वाल बनाए।
देखूँ  मैं  भी टुकटुक-टुकटुक।
ऐ सखि साजन ? न सखि फेसबुक ।।5

 
भले बुरे  का  भेद न जाने।
सबको लाइक  कहे मनाने।
सखि जानूं ना री इसका तुक।
ऐ सखि साजन ? न री फेसबुक ।।6
 
शान्त  रहे  या  शोर मचाए।
सम्मुख हो तो दिल धड़काए।
कभी  खींच ले आगे बढ़कर।
ऐ सखि साजन ? ना सखि सागर ।।7
 
प्यार सिखाए मान बढाए।
जीवन भर वह साथ निभाए।
देख दंग हुई उसके कर्म।
ऐ सखि साजन ? ना सखी धर्म ।।8
 
पल में कितने कोस घुमाता।
दुनियाभर की सैर कराता।
लगता है सखी जम्बोजेट।
ऐ सखि साजन ? ना सखी नेट ।।9
 
बात न सुनता ज़रा न टलता
मेरे    आगे-पीछे    चलता
हे    ईश्वर यह  कैसी माया
क्या सखि साजन ? ना सखि साया ।।10
 
आये-जाए दिल धड्काए
कभी बिठाए साथ घुमाए
उस पर आता मुझको प्यार
ए सखी साजन ? ना सखि कार ।।11
 
#
~ अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र'


 


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