जिसका
आँचल शीश पर, रखता हर पल छाँव।
वो ही
मिट्टी फूल है, वही
सजन का गाँव।।
सभी ओर
जब झूठ का, होता
है सत्कार।
आईना सच
बोलकर, तब पाता है हार।।
लोहे
को भी मोम-सा, पिघलाता हर
बार।
कच्चा काला
कोयला, बनता जब अंगार।।
सबकी होती
जय-विजय, पाते हैं सब
हार।
जीवन इसके
साथ ही, करना है
स्वीकार।।
मैले कर्मों की पड़ी, एक बार भी थाप।
यह जीवन होगा
नरक, छोड़ो करना पाप।।
दहशतगर्दी से हुए, सभी घाव नासूर।
जागो मतवालों तुम्हें, बुला
रहा सिन्दूर।।
चलते-चलते आ गया,
जीवन का वह छोर।
श्वास कहे जब दूर जा,
खींचे माया डोर।।
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~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
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