प्रेम
ऋतु मधुमास
शीतकाल की
ठिठुरन को दूर करने जब प्रकृति मौसम में गुनगुनापन घोल देती है। तब प्रत्येक पंछी
अपने पर फैलाना चाहता है। प्रत्येक इंसान घर से बाहर निकलकर एक नयी ताज़गी पाता है।
तभी प्रकृति भी वृक्षों की सूनी शाखों में क़ैद नयी कोपलों को बाहर लाती है। ऐसी ही
ऋतु पर कुछ दोहे ख़ास उनके लिए जो जीवन को उत्साह से, उल्लास से भर देना चाहते हैं।
नया प्यार उल्लास नव, नव से सबको आस।
लिए प्रीति
का पर्व वह, आता है मधुमास।।
तोड़ पुष्प मधुमास
में, घूमें अलि स्वच्छंद।
लेता ख़ुशबू देह की,
चूस रहा मकरंद।।
महुआ
आम पलाश सब, बँधा रहे हैं आस।
लौटेंगे जल्दी सजन,
आया है मधुमास।।
कुहू-कुहू कोयल करे,
पीं-पीं करते मोर।
आया है मधुमास
यह, जान गये चितचोर।।
मौसम ने बहका दिया, ऐसी चल दी चाल।
बौराया हर अंग है,
देख आम की डाल।।
खिले
पुष्प मधुमास में,
भिन्न-भिन्न हैं रंग।
महक दिलों को छू रही, मन हो गया पतंग।।
बेकल हैं मधुमास
में, मन में जगा उमंग।
प्रेम-प्रीति
के प्यार के,
भीने-भीने रंग।।
फिर-फिर करवट ले रही, मन की सुप्त उमंग।
जाने क्या मधुमास में,
चढ़ा प्रेम का रंग।।
मिलकर महुआ कामशर, लुटा रहे हैं
गंध।
चढ़ा रंग
मधुमास का, टूटा हर प्रतिबन्ध।।
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अशोक
रक्ताले ‘फणीन्द्र’
