1
बेटियों से
माताएँ हैं,
माताओं से बेटियाँ हैं,
बेटी से ही
सारे घर,
भर में उमंग है।
कोई कहे तितलियाँ, कोई कहे
फूल इन्हें,
कोई बोले छोरी बिन, डोर की पतंग है।
जानता है मन का पतंगा हर हाल यहाँ,
पग-पग पर बिटिया ही यहाँ तंग है।
कहीं पे दहेज़ कहीं आग के हवाले किया,
कहीं बिटिया की व्यभिचारियों से जंग
है।।
2
बेटियों से
माताएँ हैं,
माताओं से बेटियाँ हैं,
बेटी से ही
सारे घर,
भर में उमंग है।
कोई कहे तितलियाँ, कोई कहे
फूल इन्हें,
कोई बोले छोरी बिन, डोर की पतंग है।
जानता है मन का पतंगा हर हाल यहाँ,
पग-पग पर बिटिया ही यहाँ तंग है।
कहीं पे दहेज़ कहीं आग के हवाले किया,
कहीं बिटिया की व्यभिचारियों से जंग
है।।
3
महकतीं
नन्हीं-नन्हीं,
जीवन की बगिया में,
प्यारी-प्यारी
फूलों जैसी,
रहतीं हैं बेटियाँ।
माँगें न
जमीन धन,
दौलत न जायदाद,
रिश्तों की
कमान बस,
गहतीं हैं बेटियाँ।
जानता
कुटुम्ब और,
सारा ही समाज यहाँ,
दुनिया
चलाने सभी,
महतीं हैं बेटियाँ।
सब कुछ
सहतीं हैं,
झरनों-सी बहतीं हैं,
फिर भी
दहेज पर,
दहतीं हैं बेटियाँ।।
4
रंग भरे
फूलों वाली,
झुकी-झुकी शाख पर,
नन्हीं-नन्हीं
कलियों-सी,
होतीं सदा बेटियाँ।
घर महकाएँ और, आँगन उल्लास
भरें,
खिली-खिली
परियों-सी,
होतीं सदा बेटियाँ।
कभी हैं
शहद और,
कभी मीठे गुड़ वाली,
मीठी-मीठी
डलियों-सी,
होतीं सदा बेटियाँ।
कुल का
सम्मान आन,
और पहचान बनीं,
धीरवान ललियों-सी, होतीं सदा बेटियाँ।।
5
जुगनू से रोशनी भी, नहीं मिल पाती यहाँ,
कहने को समाज में, उजाला ही उजाला है।
काले मन
काले तन, देते हैं कुचन सारे,
काले दिल वालों की, जुबानों पर ताला है।
चुप है समाज बिटिया के अधिकार पर,
छीन रहा कहीं खुद, बेटी का निवाला है।
माताएं तो जन्म देने से ही कतराने
लगी,
बिटिया का अब प्रभु, तू ही रखवाला है।।
6
बातें
नारियों की तो,
बहुत करते हैं नर,
किन्तु
नहीं देते कभी,
नारियों को मान हैं।
कोख में
समाप्त कर,
बेटियों को मार कर,
समझते नर
सब,
इसको ही शान हैं।
पूजते हैं
भारत में,
घर-घर बेटियों को,
इसका भी
रखते न,
नर कभी भान हैं।
कभी तो
दहेज़ की ही,
बलि चढ़ जाती बेटी,
और जीतीं
कभी-कभी,
मरों के समान है।।
7
मात-पिता
सेवा कर,
घर से निकल कर,
दुनिया में
मान आज,
पा रहीं हैं नारियाँ।
ऊँचे-ऊँचे
पदों पर,
शोभित हैं आजकल,
और नये
पदों पर,
आ रहीं हैं नारियाँ।
सेना में
मुकाम बना,
आगे को हैं बढ़ चलीं,
और आगे
बढ़ीं नित,
जा रहीं हैं नारियाँ।
नर को
चुनौती अब,
देतीं बढ़-चढ़ कर,
यहाँ-वहाँ
जहाँ-तहाँ,
छा रहीं हैं नारियाँ।।
8
नारियों की
जहाँ-तहाँ,
लाज लूटते शृगाल,
जहाँ-तहाँ
नारियों से,
होता भेदभाव है।
कोई गली
गाँव या कि,
नगर प्रदेश कोई,
सूने पथ
शृगालों का,
रहता जमाव है।
व्यवस्था
लचर और क़ानून लचर सारे,
आचार सचर
का भी कितना दबाब है।
मात-पिता
साथ-साथ,
सारा ही समाज सहे,
कितना अजब
हर घर में तनाव है।
