फागुन की बहकी हवा

फागुन की हवा


 

निपट अनाडी रात ने, मुँह फेरा हरबार।
जब-जब की है चाँद ने, रंगों की बौछार।।

 

फागुन  के  आगोश में, गदगद हुआ शरीर।
उड़ा ले गया धुंध जब, बहता सरल समीर।।

 

गोरी के चंचल नयन, खोजें मन का चैन।

अधमुंदी पलकें लिए, फागुन की हर रैन।।

 

दामन में होगी फ़कत, इस फागुन की याद।
गूँजेंगे   हर    रंग   के, कानों    में   संवाद।।

 

फागुन ने हौले लिखा, आँचल पर हर हाल।

इसी बहाने बुन दिया, चुम्बन का इक जाल।।

 

बस्ती-बस्ती  गा रही, बंजारों   से  गीत।

फागुन की बहकी हवा, लेकर मन में प्रीत।।

 

लाया  है  फागुन पुनः, सारे   देसी   रंग।

ढपली चिमटा ढोलकी, ताल मँजीरा चंग।।

 


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