मुश्किल में आवाम
ख़त्म नहीं होते कभी, इस जीवन के काम।
और मनुज पाता नहीं, यहाँ कभी आराम।।
सोने से तुलता समय, मिले सदा बेदाम।
निर्धारित कर लक्ष्य हर, अभी
न कर विश्राम।।
लूटें मन का चैन भी,
छीने हर आराम।
महँगाई बाज़ार की, हर
दिन बढ़ते दाम।।
पढ़े-लिखे मजबूर
हैं, ठेके पर हों काम।
नेताओं की मौज है,
मुश्किल में आवाम।।
धरा कभी थकती नहीं,
सूर्य न ले विश्राम।
तब पाता है
यह जहाँ, जीवन में आराम।।
अब शासन की नीति
में, कहाँ रहे श्रीराम।
सत्य लिखा ही
रह
गया, झूठ वसूले दाम।।
देवनदी की-सी दशा, हर सरिता की आज।
फिर भी आँखें मूँदकर, बैठा
हठी समाज।।
हर निर्धन
की आस है, आएँ
अबकी बार।
करें तीर से राम फिर, रावण का संहार।।
स्याह रात का अंत कर,
लाना है नव भोर।
उम्मीदों के दीप रख, हो प्रकाश
चहुँओर।।
#
~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
