'चल रही गूँगी हवाएँ' नवगीत संग्रह की समीक्षा श्री अशोक शर्मा 'कटेठिया जी द्वारा

 


 

 

समकालीन जीवन का गीतात्मक प्रतिपक्ष : अशोक रक्ताले फणीन्द्र' के नवगीत-

संग्रह 'चल रही गूँगी हवाएँ' पर एक समालोचनात्मक दृष्टि

                                                                        - अशोक शर्मा 'कटेठिया'

समकालीन हिन्दी नवगीत ने अपने विकास क्रम में लोकजीवन, सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक चेतना और समय की विसंगतियों को जितनी व्यापकता से आत्मसात किया है, अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' का नवगीत-संग्रह 'चल रही गूँगी हवाएँ' उसी परम्परा की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आता है। यह संग्रह केवल गीतात्मक अभिव्यक्ति का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि हमारे समय की राजनीतिक विडम्बनाओं, सामाजिक असमानताओं, मानवीय संवेदनहीनता, पर्यावरणीय संकट और टूटते जीवन मूल्यों का साक्ष्य भी है। कवि अपने समय का केवल दर्शक नहीं है; वह उसके भीतर उपस्थित पीड़ा, आक्रोश, प्रतिरोध और आशा का संवेदनशील साक्षी है।

संग्रहका शीर्षक ही इसकी मूल संवेदना का संकेत देता है। "गूँगी हवाएँ" उस समय का प्रतीक हैं जिसमें अन्याय, हिंसा, छल और असत्य तो मुखर हैं, किन्तु सत्य, संवेदना और प्रतिरोध के स्वर दबा दिए गए हैं। संग्रह की शीर्षक- कविता की पंक्तियाँ इस भावभूमि को अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से उद्घाटित करती हैं-

 

धूप ने वाचाल होकर

लो बुलायी हैं सभाएँ,

शान्त बैठे सिर फिरंगी,

चल रही गूँगी हवाएँ।

(चल रही गूँगी हवाएँ, पृष्ठ 68)

 

इन पंक्तियों में "धूप" का वाचाल होना और "हवाओं" का गूँगा हो जाना एक गहरे सामाजिक रूपक का निर्माण करता है। यहाँ प्रकृति का दृश्य नहीं, बल्कि व्यवस्था का चरित्र उद्घाटित होता है। जिसे बोलना चाहिए वह मौन है और जिसे मौन रहना चाहिए वह शोर मचा रहा है। यही विडम्बना पूरे संग्रह में विविध रूपों में उपस्थित रहती है।

संग्रह का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' नवगीत को केवल भावाभिव्यक्ति का माध्यम नहीं मानते, बल्कि उसे सामाजिक हस्तक्षेप और मानवीय चेतना के सशक्त उपकरण के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। उनके गीतों में लोकधर्मी भाषा, सघन प्रतीक, प्रभावी व्यंग्य, सहज लय तथा समकालीन जीवनानुभव का ऐसा समन्वय मिलता है, जो उन्हें वर्तमान हिन्दी नवगीत की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में स्थान दिलाता है।

    इसी दृष्टि से ‘चल रही गूँगी हवाएँ' को समकालीन हिन्दी नवगीत का ऐसा संग्रह कहा जा सकता है, जिसमें समय का यथार्थ केवल अभिव्यक्त नहीं होता, बल्कि पाठक को उसके प्रति सजग, संवेदनशील और आत्मालोचनशील भी बनाता है।

 

अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र : व्यक्तित्व एवं कृतित्व

 

समकालीन हिन्दी काव्य-जगत में अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' उन सशक्त रचनाकारों में हैं जिन्होंने पारम्परिक छन्दों की गरिमा को अक्षुण्ण रखते हुए उसे समकालीन जीवन-बोध और सामाजिक सरोकारों से जोड़ा है। उनका जन्म 08 अगस्त 1960 को मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक नगर उज्जैन में हुआ। प्रारम्भ से ही साहित्यिक एवं सांस्कृतिक वातावरण ने उनकी संवेदनशीलता को विकसित किया।

 

उन्होंने विदयुत यान्त्रिकी में पत्रोपाधि तथा जियोलॉजी में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। व्यावसायिक जीवन में वे मध्यप्रदेश पॉवर ट्रांसमिशन कम्पनी लिमिटेड, उज्जैन में कार्यरत रहे और वहीं से सेवानिवृत्त हुए। तकनीकी पृष्ठभूमि से जुड़े होने के बावजूद उनकी साहित्य साधना निरन्तर सक्रिय रही, जिसने उन्हें समकालीन छन्द-काव्य के प्रतिष्ठित हस्ताक्षरों में स्थान दिलाया।

 

अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' की रचनात्मक रुचि अत्यन्त व्यापक है। वे सनातनी छन्द, गीत, नवगीत, कविता, ग़ज़ल, दोहा, कुण्डलिया तथा अन्य छन्दोबद्ध काव्य- विधाओं में समान अधिकार के साथ लेखन करते हैं। उनकी रचनाओं में सामाजिक विसंगतियों के प्रति सजग दृष्टि, मानवीय संवेदना, लोकजीवन की गहरी पहचान, सांस्कृतिक चेतना तथा व्यंग्य का संतुलित स्वर मिलता है। वे परम्परा के समर्थक होते हुए भी समय की चुनोतियों से सीधा संवाद स्थापित करते हैं।

 

वे साहित्यिक सम्पादन के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं। उन्होंने 'कल्लोलिनी' साहित्यिक पत्रिका तथा 'ग़ज़लांजलि' के वार्षिक अंक का सफल सम्पादन किया है, जिससे अनेक रचनाकारों को अभिव्यक्ति का मंच प्राप्त हुआ ।

 

उनकी प्रकाशित कृतियों में 'जीवनराग' (कुण्डलिया संग्रह), 'मन पर फागुन रंग' (दोहा संग्रह) तथा 'घनाक्षरी दण्डक' विशेष उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त वे अनेक महत्वपूर्ण साझा काव्य संकलनोंकुण्डलिया संचयन', 'हलधर के हालात', 'दोहे मेरी पसन्द के', 'आधुनिक मुकरियाँ, 'अभिनव कुण्डलिया', 'दोहा-प्रसंग', 'इक्कीसवीं सदी की कुण्डलिया', 'समकालीन मुकरियाँ', 'समकालीन कुण्डलिया शतक', 'सुरसरी के स्वर तथा 'फुलबगिया' (पर्यावरणीय साझा काव्य-संकलन) में भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

 

उनकी साहित्य-साधना को विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। उन्हें 'छन्दशास्त्री सम्मान' (2017) तथा 'काव्य-गौरव सम्मान' (2019) सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं, जो उनके छन्द-कोशल और साहित्यिक योगदान की स्वीकृति के प्रमाण हैं।

 

अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' का नवगीत-संग्रह 'चल रही गूँगी हवाएँ’ उनकी रचनात्मक चेतना का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। इस संग्रह में समकालीन सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा पर्यावरणीय यथार्थ को सशक्त प्रतीकों, लोकधर्मी भाषा और प्रभावी व्यंग्य के माध्यम से अभिव्यक्ति मिली है। उनके नवगीत जीवन के संघर्ष, मानवीय मूल्यों के क्षरण, लोकतांत्रिक विडम्बनाओं, प्रकृति-संकट तथा लोकजीवन की पीड़ा को गहरी संवेदना के साथ प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि वे समकालीन हिन्दी नवगीत की परम्परा में एक सजग, प्रतिबद्ध और समर्थ रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

 

समकालीन यथार्थ का सशक्त दस्तावेज़

 

अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' के नवगीत-संग्रह 'चल रही गूँगी हवाएँ' का सबसे प्रभावशाली पक्ष उसका तीक्ष्ण समय-बोध है। यह संग्रह अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विसंगतियों का केवल वर्णन नहीं करता, बल्कि उनके मूल कारणों की ओर संकेत करते हुए एक सजग नागरिक चेतना का निर्माण करता है । कवि अपने समय के संकटों को बाहरी घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा पर पड़ने वाले आघात के रूप में देखता है। इसलिए उसके गीतों में प्रतिरोध का स्वर भी है और परिवर्तन की आकांक्षा भी।

 

आज का भारतीय समाज जातीय विद्वेष, राजनीतिक अवसरवाद, लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण, आर्थिक असमानता तथा नैतिक पतन जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। कवि इन परिस्थितियों को बिना किसी लाग-लपेट के सामने रखता है। उसकी दृष्टि किसी राजनीतिक दल विशेष तक सीमित नहीं है; वह सत्ता-व्यवस्था की उस मानसिकता पर प्रहार करता है जो जनहित की अपेक्षा स्वार्थ और सत्ता-संरक्षण को प्राथमिकता देती है। यह व्यंग्य शीर्षक गीत की निम्न पंक्तियों में अत्यन्त तीक्ष्ण होकर सामने आता है-

 

जाति-पाँति में भेद, बढ़े तो नज़रें फेरो,

आये सिर पर बात, उठो सड़कों को घेरो।

अमृत नाम को छोड़ हवाओं में विष घोलो,

का ढोंग करो, पर सच मत बोलो।।

(सच्चाई का ढोंग करो, पृष्ठ 60)

 

यहाँ कवि लोकतांत्रिक राजनीति की विडम्बनाओं को व्यंग्यात्मक शैली में उद्घाटित करता है। "सच्चाई का ढोंग" और "सच मत बोलो" जैसी विरोधाभासी संरचना समकालीन सार्वजनिक जीवन के नैतिक पतन का अत्यन्त प्रभावी रूपक बन जाती है।

 

इसी गीत का अगला चरण राजनीतिक स्वार्थ और वोट बैंक की राजनीति पर और अधिक तीखा प्रहार करता है-

 

बढ़ने दो विद्वेष, वोट तुमको पाना है,

इतना ही है सत्य, अन्य आना-जाना है।

निर्धन को दो आस, संग उसके तुम रो लो,

सच्चाई का ढोंग करो, पर सच मत बोलो।।

(सच्चाई का ढोंग करो, पृष्ठ 60)

 

इन पंक्तियों में चुनावी राजनीति का खोखलापन, निर्धनों के प्रति दिखावटी सहानुभूति तथा सामाजिक विभाजन की राजनीति का यथार्थ अत्यन्त सघन रूप में व्यक्त हुआ है। यहाँ व्यंग्य केवल हास्य उत्पन्न नहीं करता, बल्कि पाठक को भीतर तक विचलित करता है।

 

संग्रह में व्यवस्था की संवेदनहीनता केवल राजनीतिक स्तर तक सीमित नहीं रहती; वह सामाजिक संरचना में भी दिखाई देती है। मनुष्य की निष्क्रियता और सामाजिक मौन पर कवि गहरी चोट करता है-

भौंक रहे हैं श्वान गली में,

नर खामोश खड़े।

खुले नयन से देख रहे हैं,

चिकने सभी घड़े ।।

(कितनी तनहाई है, पृष्ठ 58)

यहाँ "भोंकते श्वान" अराजक शक्तियों के प्रतीक हैं, जबकि "खामोश खड़े नर" समाज की निष्क्रिय चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं। कवि संकेत करता है कि जब सज्जन समाज मोन हो जाता है, तब असामाजिक शक्तियाँ स्वाभाविक रूप से प्रभावी हो उठती हैं।

 

कवि की सामाजिक दृष्टि पर्यावरण और औद्योगिक विकास की विडम्बनाओं तक भी पहुँचती है। वह तथाकथित विकास के पीछे छिपे विनाशकारी पक्ष को पहचानता है-

 

औद्योगिक संस्थान, चूस लें जब भी पानी,

होगी किसकी मौत, मरेगी किसकी जानी।

छोड़ो चिन्ता-फिक्र, मरे पर ही सब ढोलो,

सच्चाई का ढोंग करो, पर सच मत बोलो।।

(सच्चाई का ढोंग करो, पृष्ठ 59)

 

यहाँ जल संकट, औद्योगिक प्रदूषण और शासन की उदासीनता एक साथ उद्घाटित होती है। यह नवगीत समकालीन पर्यावरणीय विमर्श को भी सामाजिक न्याय के प्रश्न से जोड़ देता है।

 

इसी प्रकार कवि लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्प्रभाविता और आलोचनात्मक चेतना के क्षरण को भी रेखांकित करता

 

सत्य सहता झूठ के ही

रात-दिन नश्तर ।

शान्त होते जा रहे

आलोचना के स्वर ।।

(आलोचना के स्वर, पृष्ठ 31)

 

इन पंक्तियों में " आलोचना के स्वर" का शान्त हो जाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वैचारिक असहमति और लोकतांत्रिक संवाद के कमजोर पड़ने का संकेत है। यह केवल साहित्यिक कथन नहीं, बल्कि समकालीन सामाजिक यथार्थ का गम्भीर विश्लेषण भी है।

 

उनका नवगीत 'खड़ा लुटेरा है' समकालीन व्यवस्था की भयावहता, असुरक्षा और नैतिक अवमूल्यन का सशक्त दस्तावेज़ बनकर सामने आता है। कवि लिखते हैं-

 

चक्रव्यूह में फँसे हुए सब, हुआ अँधेरा है।

हाथ साँप के, दे बन्दूकें, गया सपेरा है।।

(पृष्ठ 95)

 

इन पंक्तियों में 'चक्रव्यूह', 'साँप, 'सपेरा' और 'अँधेरा जैसे प्रतीकों के माध्यम से ऐसी व्यवस्था का चित्र उभरता है, जहाँ रक्षक ही विनाश के उपकरण सौंपकर स्वयं पलायन कर चुके हैं। यह केवल राजनीतिक विफलता का संकेत नहीं, बल्कि सामाजिक नेतृत्व और नैतिक उत्तरदायित्व के संकट का भी सशक्त रूपक है।

 

इसी प्रकार -

 

बाहर तत्पर, मौक़ा तकता, खड़ा लुटेरा है।

(पृष्ठ 95)

 

यह पंक्ति पूरे नवगीत का ध्रुवपद बनकर समकालीन समाज में व्याप्त भय, असुरक्षा और अवसरवादी प्रवृत्तियों का प्रतिनिधि बिम्ब बन जाती है। 'लुटेरा' यहाँ किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस समूची शोषक व्यवस्था का प्रतीक है जो समाज की दुर्बलता और अव्यवस्था का लाभ उठाने के लिए सदैव तत्पर रहती है।

 

इन समस्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि ‘चल रही गूँगी हवाएँ' अपने समय का विश्वसनीय सामाजिक दस्तावेज़ है । कवि घटनाओं का इतिहास नहीं लिखता, बल्कि समय की अन्तर्ध्वनियों को स्वर देता है। उसके यहाँ यथार्थ केवल निराशा का पर्याय नहीं है; वह पाठक को चेताने, सोचने और व्यवस्था से प्रश्न करने की प्रेरणा भी देता है। यही कारण है कि यह संग्रह समकालीन हिन्दी नवगीत की सामाजिक प्रतिबद्धता का एक सशक्त उदाहरण बनकर सामने आता है।

 

लोकजीवन और ग्रामीण संवेदना

 

समकालीन नवगीत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी लोकधर्मी चेतना है। अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' का नवगीत -संग्रह 'चल रही गूँगी हवाएँ' इस दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है। संग्रह का कवि गाँव को केवल स्मृति या रोमानी कल्पना के रूप में प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उसके बदलते सामाजिक यथार्थ, किसान की पीड़ा, श्रमशील जीवन, प्राकृतिक परिवेश तथा लोक-संस्कृति के विघटन को अपनी संवेदना का आधार बनाता है। यहाँ लोकजीवन का चित्रण बाह्य वर्णन नहीं, बल्कि आत्मीय अनुभव की अभिव्यक्ति है।

 

कवि की दृष्टि गाँव के उस बदलते परिवेश पर है जहाँ प्रकृति और मनुष्य दोनों संकट में हैं। उसकी पीड़ा सबसे पहले पर्यावरण और ग्रामीण जीवन की टूटती संरचना में व्यक्त होती है-

 

सूने हैं उद्यान सभी,

और चिरैया है प्यासी।

सुस्ताती सड़कें सारी,

दौड़ें जो बारहमासी।

जिस पर फूलों का मौसम,

शुष्क पड़ी वह क्या है।।

(कैसी यह लाचारी है, पृष्ठ 56 )

 

यहाँ "प्यासी चिरैया", "सूने उद्यान" और "शुष्क क्यारी" केवल प्रकृति के दृश्य नहीं हैं, बल्कि उस ग्रामीण जीवन के प्रतीक हैं जहाँ जीवन की सहजता और उल्लास धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। प्रकृति की यह उदासी दरअसल मनुष्य की भी उदासी है।

 

लोकजीवन के प्रति कवि का गहरा अनुराग गौरेया जैसे छोटे-से पक्षी के माध्यम से भी व्यक्त होता है। आधुनिक विकास और पर्यावरणीय असंतुलन के कारण लुप्त होती गौरैया के बहाने वह पूरे ग्रामीण परिवेश के संकट को रेखांकित करता है -

 

गौरैया क्यों हुई अभागी,

बोलो रे भाई ।

सावन फागुन सूना-सूना,

ताप बढ़ा सूरज का दूना।

नदिया सूखी फिर से खोजे अपनी तरुणाई ।।

(गौरैया क्यों हुई अभागी, पृष्ठ 47 )

 

गोरैया यहाँ केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि भारतीय गाँव की जीवंत संस्कृति का प्रतीक बन जाती है। सावन और फागुन का सूना हो जाना लोक उत्सवों के क्षीण पड़ते स्वर और प्रकृति से मनुष्य के टूटते सम्बन्ध की ओर संकेत करता है।

 

इसी गीत का अगला अंश लोकजीवन और वन-संस्कृति के विनाश को और अधिक व्यापक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करता है –

 

कटी हुई शाखों से पूछे,

इमली की डालों से पूछे ।

क्यों वन प्रान्तर पशु-सी अनगढ़,

मानव चतुराई ।

 

तेंदू, महुआ, चार, बहेड़ा-

(गोरैया क्यों हुई अभागी, पृष्ठ 48 )

 

यहाँ "तेंदू", "महुआ", "चार" और "बहेड़ा" जैसे वृक्ष केवल वनस्पतियाँ नहीं हैं; वे आदिवासी और ग्रामीण जीवन की आर्थिक-सांस्कृतिक पहचान हैं। इनका लुप्त होना केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि लोक-संस्कृति के क्षरण का भी संकेत है।

कवि ग्रामीण जीवन की समस्याओं को केवल प्रकृति तक सीमित नहीं रखता, बल्कि किसान के श्रम और उसकी असहायता को भी मार्मिक ढंग से चित्रित करता है-

 

पक चुकी हर एक बाली,

बोझ बनती जा रही है।

कौन काँधे पर उठाए.

******

कौन मंगल गीत गाए।

(उलझनों की दुष्ट टोली, पृष्ठ 49)

 

यहाँ पकी हुई फसल भी किसान के लिए उत्सव नहीं, बल्कि चिंता का कारण बन जाती है। श्रम का उचित प्रतिफल न मिल पाने की पीड़ा इन पंक्तियों में अत्यन्त सहज किन्तु प्रभावशाली रूप में व्यक्त हुई है।

कवि लोकजीवन की विषमताओं को केवल करुणा के स्वर में नहीं देखता, बल्कि उसके भीतर जीवट और संघर्ष की चेतना भी पहचानता है। इसलिए वह निराशा के बीच भी आशा का दीप जलाए रखता है-

 

धैर्य अभी तक ज़िन्दा है.

और सभी पर भारी है।

( कैसी यह लाचारी है, पृष्ठ 56)

 

यह छोटी-सी पंक्ति संग्रह की मूल जीवन-दृष्टि को अभिव्यक्त करती है। तमाम अभावों, संकटों और विघटन के बावजूद भारतीय लोकजीवन अपनी जिजीविषा नहीं खोता । यही विश्वास इस संग्रह को केवल करुणा का दस्तावेज़ नहीं रहने देता, बल्कि उसे जीवन-संघर्ष का गीत बना देता है।

 

स्पष्ट है कि चल रही गूँगी हवाएँ में लोकजीवन किसी आंचलिक सजावट का साधन नहीं है। वह कवि की वैचारिक और भावात्मक चेतना का केन्द्र है। गाँव, किसान, प्रकृति, लोक भाषा और श्रम - इन सबके माध्यम से अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' भारतीय समाज की उस आत्मा को स्वर देते हैं, जो विकास की अंधी दौड़ में लगातार उपेक्षित होती जा रही है। यही लोकधर्मी संवेदना उनके नवगीतों को समकालीन नवगीत परम्परा में विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।

 

मानवीय संबंधों का विघटन और संवेदनात्मक संकट

 

अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' के नवगीतों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वे केवल राजनीतिक और सामाजिक विसंगतियों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि बदलते मानवीय संबंधों की गहरी पड़ताल भी करते हैं। आधुनिक जीवन की भागदौड़, उपभोक्तावादी मानसिकता, स्वार्थपरक दृष्टि और संवादहीनता ने मनुष्य को भीतर से जितना अकेला बनाया है, उसका अत्यन्त मार्मिक चित्रण इस संग्रह में मिलता है। कवि के लिए संबंधों का संकट केवल परिवार का संकट नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सामाजिक संरचना के विघटन का संकेत है।

 

इस संवेदनात्मक विघटन का सबसे मार्मिक चित्र " तन्हाई" के बिंबों में उभरता है-

 

चुभते सन्नाटे में हर

आवाज समायी है।

कितनी तन्हाई है।

मरघट जैसा शहर हुआ.

रिश्ते गूँगे सारे,

अपनेपन के टूट गये

टिमटिम करते तारे ।

कैसी अरुणाई है।

(कितनी तनहाई है, पृष्ठ 57)

 

यहाँ "मरघट जेसा शहर" आधुनिक महानगरीय जीवन का अत्यन्त सशक्त रूपक है। भीड़ के बीच रहते हुए भी मनुष्य अकेला है। रिश्ते जीवित अवश्य हैं, किन्तु उनमें संवाद, आत्मीयता और विश्वास का प्रकाश शेष नहीं रहा।

 

कवि मानवीय संबंधों में बढ़ती स्वार्थपरता को भी बड़ी सहजता से चित्रित करता है-

 

पास-पड़ोसी आँख फेरते,

कोई सगा नहीं।

मतलब की यारी ने अब तक,

किसको ठगा नहीं।

(कितनी तनहाई है, पृष्ठ 58)

 

इन पंक्तियों में सामाजिक जीवन की बदलती प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है। पड़ोसी, जो कभी भारतीय जीवन-पद्धति का अभिन्न अंग था, अब केवल औपचारिक उपस्थिति बनकर रह गया है। आत्मीयता का स्थान स्वार्थ ने ले लिया है। कवि बिना किसी अतिरिक्त टिप्पणी के केवल दृश्य प्रस्तुत करता है और वही दृश्य पूरे सामाजिक परिवर्तन का साक्ष्य बन जाता है।

 

मानवीय संबंधों का यह संकट परिवार तक भी सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यक्ति के अंतर्मन तक पहुँच जाता है। संवाद की समाप्ति और भावनाओं का दमन कवि को गहरे स्तर पर उद्वेलित करता है-

 

आसमानों से उतरकर भी

हवा बोली नहीं।

पट हृदय के खोल भीनी

गंध तक घोली नहीं।

(हवा बोली नहीं, पृष्ठ 35)

 

यहाँ "हवा" संवेदना ओर संवाद का प्रतीक है। उसका "न बोलना" केवल प्रकृति का मोन नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर मरती हुई आत्मीयता का संकेत है। हृदय के पट बंद हैं, इसलिए प्रेम और विश्वास की सुगंध भी वातावरण में नहीं फेल पा रही।

इसी गीत में कवि पीड़ा के उस बिन्दु तक पहुँचता है जहाँ मनुष्य अपनी वेदना भी व्यक्त नहीं कर पाता -

कौन जाने किसलिए,

पर खुद जुबाँ खोली नहीं।

****

मिट गया सिन्दूर सारा,

जब सजी रोली नहीं।

(हवा बोली नहीं, पृष्ठ 36)

इन पंक्तियों में मौन की त्रासदी अत्यन्त गहन हो उठती है । "सिन्दूर" और "रोली" जैसे सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से कवि बताता है कि संबंधों का बाहरी स्वरूप बचा रह सकता है, किन्तु यदि विश्वास और संवाद समाप्त हो जाएँ तो उनका वास्तविक अर्थ भी समाप्त हो जाता है।

 

संग्रह में मनुष्य की आत्मकेन्द्रित मानसिकता पर भी सूक्ष्म व्यंग्य मिलता है-

 

बढ़ी समझ तो हमने पाया,

है केवल तेरा मेरा ।

कुछ झुंझलाए तो थे लेकिन,

आखिर था मुँह फेरा।

(कुछ जागे कुछ सोये, पृष्ठ 38 )

 

यहाँ कवि आधुनिक मनुष्य के संकुचित होते सामाजिक दायरे की ओर संकेत करता है । "तेरा मेरा" की मानसिकता ने सामूहिकता, साझेदारी और सह-अस्तित्व की भावना को कमज़ोर कर दिया है। यही प्रवृत्ति अंततः सामाजिक विखंडन का कारण बनती है।

स्पष्ट है कि अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' के नवगीतों में मानवीय संबंधों का संकट केवल भावुकता का विषय नहीं है। वह सामाजिक परिवर्तन, सांस्कृतिक विघटन और नैतिक अवमूल्यन की व्यापक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। कवि संबंधों की टूटन पर विलाप नहीं करता, बल्कि उसके कारणों की ओर संकेत करते हुए पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है। यही कारण है कि इस संग्रह की संवेदना निजी होकर भी सार्वभौमिक बन जाती है और समकालीन मनुष्य के अकेलेपन की विश्वसनीय अभिव्यक्ति बनकर सामने आती है।

 

प्रकृति और पर्यावरण चेतना

 

अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' के नवगीतों में प्रकृति केवल सौन्दर्य का आलम्बन नहीं है, बल्कि मानवीय जीवन, लोक- संस्कृति और पर्यावरणीय संतुलन का आधार है। उनके यहाँ प्रकृति का चित्रण छायावादी भावुकता से भिन्न है। वे प्रकृति को उसके वास्तविक संकटों के साथ देखते हैं। जंगलों का क्षरण, जल संकट, पक्षियों का लुप्त होना, ऋतु-चक्र का असंतुलन और प्रदूषित पर्यावरण- ये सभी उनके नवगीतों में समकालीन जीवन की गंभीर समस्याओं के रूप में उपस्थित होते हैं। इस दृष्टि से उनके नवगीत पर्यावरणीय चेतना के भी महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ हैं।

 

कवि प्रकृति के बदलते स्वरूप को अत्यन्त मार्मिक प्रतीकों में व्यक्त करता है-

 

बादल से झर-झर अंगारे

क्यूँ बरसाते हो,

 

लोट रही सब तन की गर्मी

सपने ख़ाक हुए.

पकने से पहले ही जलकर

सौदे राख हुए

अंग-अंग सिहरन दे देकर

क्यूँ झुलसाते हो.

(अंगारे क्यूँ बरसाते हो, पृष्ठ 73)

 

यहाँ "बादलों से अंगारों का झरना" जलवायु परिवर्तन और वर्षा के असंतुलित स्वरूप का प्रभावशाली बिम्ब है। बादल जीवनदायी जल के स्थान पर मानो अग्नि बरसा रहे हैं। परिणामस्वरूप धरती की प्यास और किसान की निराशा एक- दूसरे में विलीन हो जाती हैं।

 

कवि की पर्यावरण दृष्टि केवल प्राकृतिक सौन्दर्य के चित्रण तक सीमित नहीं है, बल्कि वह बदलते जलवायु-संतुलन, बढ़ती ऊष्मा और प्रकृति पर मानवीय हस्तक्षेप के दुष्परिणामों को भी अत्यन्त संवेदनशीलता से अभिव्यक्त करता है। उसके यहाँ प्रकृति का प्रत्येक परिवर्तन पर्यावरणीय संकट का संकेत बन जाता है। वह बढ़ती गर्मी, ऋतु-चक्र के असंतुलन और जल स्रोतों के क्षरण को केवल मोसमी घटना न मानकर मानव की विकास नीति और प्रकृति-विरोधी जीवन शैली का परिणाम मानता है-

 

बाँझ दोपहर, शाम विषैली,

कैसे कदम बढ़ाएँ ।

जेठ तपेगा और भयंकर,

कैसे खैर मनाएँ ।"

( बिगड़े हैं सुर मौसम के पृष्ठ 138)

 

इन पंक्तियों में "बाँझ दोपहर" और "शाम विषैली" जैसे बिम्ब पर्यावरणीय संकट की भयावहता को साकार करते हैं। 'बाँझ' विशेषण प्रकृति की घटती उत्पादकता, हरियाली के क्षय और जीवनदायी ऊर्जा के लुप्त होने का प्रतीक है, जबकि 'विषेली शाम' प्रदूषित वातावरण और अस्वस्थ जीवन परिवेश का द्योतक बन जाती है। इसी गीत में आगे-

 

नदियों के माथे के बल को,

मुश्किल समझाना।  

छिपते-छिपते भी तो दिन अब,

जाता है झल्ला।

(पृष्ठ 138)

 

यहाँ "नदियों के माथे के बल" नदियों की पीड़ा, सिकुड़ते जल स्रोतों और उनके अस्तित्व पर आए संकट का अत्यन्त प्रभावशाली मानवीकरण है। वहीं "दिन का झल्लाकर छिपना" प्रकृति के असंतुलित और विकृत होते परिवेश का प्रतीक है। इन बिम्बों के माध्यम से कवि स्पष्ट संकेत करता है कि यदि पर्यावरण के प्रति मनुष्य की असंवेदनशीलता और दोहन की प्रवृत्ति इसी प्रकार बनी रही, तो प्रकृति का संतुलन निरन्तर बिगड़ता जाएगा। इस प्रकार कवि का नवगीत पर्यावरण-संरक्षण का संदेश देते हुए मनुष्य को प्रकृति के प्रति उत्तरदायी और संवेदनशील बनने की प्रेरणा देता है।

 

कवि पर्यावरण-संकट को केवल प्रकृति की स्वाभाविक प्रक्रिया का परिणाम नहीं मानता, बल्कि उसके मूल में मनुष्य की अविवेकपूर्ण विकास-दृष्टि, उपभोगवादी मानसिकता और पर्यावरण विनाशकारी गतिविधियों को देखता है। नदियों को प्रदूषित करना, जलाशयों में औद्योगिक अपशिष्ट, कचरा तथा धार्मिक आस्था के नाम पर अवशेषों का विसर्जन करना प्रकृति के संतुलन को निरन्तर नष्ट कर रहा है। कवि इस मानवीय संवेदनहीनता पर तीखा व्यंग्य करता है

 

लाश अस्थियाँ राख- रखौड़ा,

बहा रहे कर सीना चौड़ा।

बीमारी का कारण बनकर,

आता घर तक दौड़ा-दौड़ा।

उथले तल की चिन्ता का मल,

भरकर सभी घरों तक ले चल।

(लौटेगी फिर कलकल, पृष्ठ 30)

 

इन पंक्तियों में नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि सभ्यता की साक्षी के रूप में उपस्थित है। मनुष्य अपनी धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों के अवशेष नदियों में प्रवाहित कर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करता है, जबकि वही प्रदूषित जल रोगों और संकटों का वाहक बनकर पुनः मानव समाज के घरों तक पहुँच जाता है। "बीमारी का कारण बनकर, आता घर तक दौड़ा-दौड़ा" कथन इस कटु विडम्बना को अत्यन्त प्रभावी ढंग से उद्घाटित करता है कि प्रकृति के साथ किया गया अन्याय अंततः मनुष्य के अपने अस्तित्व पर ही संकट बनकर लोटता है। इस प्रकार कवि पर्यावरण-संरक्षण को केवल प्राकृतिक दायित्व नहीं, बल्कि मानवीय उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक चेतना का अनिवार्य अंग मानता है।

 

कवि की पर्यावरणीय दृष्टि का सबसे मार्मिक रूप गौरेया के माध्यम से सामने आता है

 

सावन फागुन सूना-सूना,

ताप बढ़ा सूरज का दूना।

नदिया सूखी फिर से खोजे

अपनी तरुणाई ।।

(गौरैया क्यों हुई अभागी, पृष्ठ 47 )

 

यहाँ गौरेया आधुनिक शहरीकरण की सबसे बड़ी पीड़ित है। "कंक्रीट का जंगल" केवल भवनों का विस्तार नहीं, बल्कि उस विकास का प्रतीक है जिसने जीव जगत के लिए जीवन-स्थल ही समाप्त कर दिए हैं। यह बिम्ब आज के पर्यावरणीय विमर्श से प्रत्यक्ष जुड़ता है।

प्रकृति और मनुष्य के परस्पर संबंध को कवि सांस्कृतिक दृष्टि से भी देखता है। वनों के विनाश के साथ केवल हरियाली नहीं जाती, बल्कि लोकजीवन की स्मृतियाँ और परम्पराएँ भी समाप्त होती जाती हैं-

 

तेंदू महुआ चार बहेड़ा,

पगडंडी-पथ टेढ़ा-मेढ़ा,

लुप्त हो गए कहो कहाँ सब,

किसने फूंकी राई | बोलो रे भाई...

(गौरैया क्यों हुई अभागी, पृष्ठ 48)

 

इन पंक्तियों में महुआ, तेंदू और बहेड़ा जैसे वृक्ष भारतीय ग्रामीण और आदिवासी संस्कृति के प्रतीक हैं। इनके लुप्त होने का अर्थ केवल जैव-विविधता का ह्रास नहीं, बल्कि लोकजीवन की सांस्कृतिक विरासत का क्षरण भी है।

 

कवि प्रकृति के माध्यम से भविष्य के प्रति चिंता भी व्यक्त करता है। उसके यहाँ पर्यावरण का प्रश्न केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित नहीं है; वह आने वाली पीढ़ियों के जीवन से जुड़ा हुआ है। इसलिए उसके नवगीत पाठक को केवल प्रकृति-प्रेम का संदेश नहीं देते, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति नैतिक उत्तरदायित्व का भी बोध कराते हैं।

 

स्पष्ट है कि चल रही गूँगी हवाएँ में प्रकृति जीवन की सहचरी है और पर्यावरण उसका अस्तित्वगत आधार अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' पर्यावरणीय संकट को मानवीय संकट से अलग नहीं देखते। उनके नवगीतों में प्रकृति की करुण पुकार वस्तुतः मनुष्य की आत्मा की पुकार है। यही कारण है कि इस संग्रह की पर्यावरण-चेतना उपदेशात्मक न होकर संवेदनात्मक और कलात्मक बन जाती है तथा समकालीन नवगीत को एक व्यापक मानवीय परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है।

 

प्रतीक- विधान, बिम्ब-योजना और भाषा-शिल्प

 

अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' के नवगीतों की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में उनकी प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति, सशक्त बिम्ब-योजना तथा लोकधर्मी भाषा प्रमुख हैं। वे जटिल सामाजिक यथार्थ को प्रत्यक्ष कथन के बजाय प्रतीकों और बिम्बों के माध्यम से व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि उनके नवगीत केवल तत्काल प्रभाव नहीं छोड़ते, बल्कि पाठक के मन में दीर्घकाल तक अपनी अर्थवत्ता बनाए रखते हैं। उनके यहाँ प्रतीक आरोपित नहीं लगते, बल्कि जीवनानुभव से स्वाभाविक रूप से प्रस्फुटित होते हैं।

संग्रहका शीर्षक 'चल रही गूँगी हवाएँ ही एक अत्यंत प्रभावशाली प्रतीक है। "गूँगी हवाएँ" उस समय की सांकेतिक अभिव्यक्ति हैं जिसमें सत्य बोलने से भय उत्पन्न होता है, संवेदनाएँ मौन हैं और अन्याय सामान्य जीवन का हिस्सा बन चुका है। इसी प्रकार संग्रह में प्रयुक्त "सन्नाटा", "प्यासी चिरेया", "सूनी क्यारी", "मरघट जैसा शहर", "पकी हुई बाली", "कंक्रीट का जंगल", "सूखी नदी", "भौंकते श्वान" जैसे बिम्ब समकालीन समाज के अनेक स्तरों को उद्घाटित करते हैं।

 

कवि की बिम्ब - सृष्टि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह प्रकृति के सहज दृश्यों के माध्यम से व्यापक मानवीय अनुभूतियों और जीवन-सत्य को अभिव्यक्त करता है। "दिन को चढ़ा बुखार" नवगीत में प्रकृति का प्रत्येक उपादान मानवीय संवेदना से अनुप्राणित होकर एक विशिष्ट वातावरण का निर्माण करता है

सूरज का ज्वर उतर गया पर,

दिन को चढ़ा बुखार।

तितली ने चादर सिलवा ली.

पत्तों को पुचकार।

मकड़ी ने भी शाख- शाख पर,

बाँधे बन्दनवार।

कुहरे के कम्बल में लिपटा,

कहता भोर पुकार।

(दिन को चढ़ा बुखार, पृष्ठ 43 )

 

यहाँ "दिन को चढ़ा बुखार" एक अत्यन्त प्रभावशाली रूपक है, जो केवल ऋतु परिवर्तन या प्राकृतिक दृश्य का संकेत नहीं देता, बल्कि समय की विषम परिस्थितियों, सामाजिक अवसाद और जीवन की अस्वाभाविक स्थिति का भी बोध कराता है। दूसरी ओर, "तितली ने चादर सिलवा ली", "मकड़ी ने शाख-शाख पर बन्दनवार बाँधे" तथा "कुहरे के कम्बल में लिपटी भोर" जैसे बिम्ब प्रकृति के सूक्ष्म परिवर्तनों को अत्यन्त सजीव मानवीकरण के साथ प्रस्तुत करते हैं। इन बिम्बों के माध्यम से कवि प्रकृति और मनुष्य के भावलोक को एकाकार कर देता है। परिणामतः प्रकृति केवल दृश्य- वर्णन का माध्यम न रहकर समय, समाज और मानवीय संवेदना की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति बन जाती है।

 

इसी प्रकार एक अन्य गीत में भाषा का सौन्दर्य प्रतीकात्मक एवं व्यंजनामूलक बिम्बों के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है -

 

गूँथ-गूँथ पायल में काँटे,

पाँव बढ़ाती बालाएँ ।

घर-आँगन में आग लगी है.

देह जलाती ज्वालाएँ ।

(देह जलाती ज्वालाएँ, पृष्ठ 39)

 

यहाँ "पायल में काँटे गूँथना" अत्यन्त मार्मिक और प्रभावशाली बिम्ब है। सामान्यतः पायल सौन्दर्य, कोमलता और उल्लास का प्रतीक है, किन्तु उसके साथ काँटों का संयोजन स्त्री-जीवन की पीड़ा, असुरक्षा और संघर्ष का सशक्त रूपक बन जाता है। इसी प्रकार "घर-आँगन में आग लगना" और "देह जलाती ज्वालाएँ" केवल वास्तविक अग्निकांड का चित्र नहीं हैं, बल्कि सामाजिक हिंसा, पारिवारिक विघटन और स्त्री- अस्तित्व पर मंडराते संकट के प्रतीक हैं। इन बिम्बों के माध्यम से कवि ने सामाजिक यथार्थ को अत्यन्त मार्मिक और कलात्मक भाषा में अभिव्यक्त किया है। भाषा की यह प्रतीकात्मकता और व्यंजना-शक्ति नवगीत को गहन संवेदनात्मक प्रभाव प्रदान करती है।

 

भाषा की दृष्टि से अशोक रक्ताले का नवगीत अत्यन्त सहज, संप्रेषणीय और लोक-संस्कृति से अनुप्राणित है। वे कृत्रिम अलंकरण या दुरूह शब्दावली का सहारा नहीं लेते। उनके शब्द सीधे लोक-जीवन से आते हैं-जैसे महुआ, तेंद्र बहेड़ा, चिरैया, क्यारी, बाली, चौपाल, आँगन, रोली, सिन्दूर, धूप, ओस, पगडंडी आदि । यही शब्द उनके गीतों को भारतीय जीवनानुभव से गहरे स्तर पर जोड़ते हैं।

 

उनकी भाषा में लोक-प्रचलित मुहावरों और बोलचाल की अभिव्यक्तियों का भी सशक्त प्रयोग मिलता है। परिणामस्वरूप गीतों में कृत्रिमता नहीं आती, बल्कि वे स्वाभाविक संवाद की तरह पाठक तक पहुँचते हैं। दूसरी ओर जहाँ व्यंग्य अपेक्षित है, वहाँ भाषा अत्यन्त तीखी ओर धारदार हो जाती है; और जहाँ करुणा या प्रकृति का चित्रण है, वहाँ वही भाषा अत्यन्त कोमल और लयात्मक रूप धारण कर लेती है। यह भाषिक लचीलापन उनके शिल्प की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

 

अलंकारों की दृष्टि से भी उनके नवगीत उल्लेखनीय हैं। रूपक, मानवीकरण, विरोधाभास, पुनरुक्ति- प्रकाश, अनुप्रास तथा प्रतीकात्मकता का प्रयोग सहज रूप में हुआ है। विशेष रूप से मानवीकरण उनके प्रिय शिल्प-उपकरण के रूप में उभरता है, जिसके माध्यम से वे प्रकृति और समाज दोनों को मानवीय संवेदना से जोड़ देते हैं।

 

इस प्रकार चल रही गूँगी हवाएँ का भाषा-शिल्प उसकी सबसे बड़ी कलात्मक उपलब्धियों में से एक है। सरल भाषा, लोकजीवन से उपजे प्रतीक, सजीव बिम्ब और नियंत्रित अलंकारिता मिलकर इन नवगीतों को एक ओर व्यापक पाठक- वर्ग के लिए सहज ग्राह्य बनाते हैं, तो दूसरी ओर गंभीर साहित्यिक विमर्श के लिए भी पर्याप्त अर्थ संभावनाएँ प्रदान करते हैं। यही संतुलन अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' को समकालीन नवगीतकारों की अग्रणी पंक्ति में प्रतिष्ठित करता है।

 

छन्द, लय और नवगीत का शिल्प सौष्ठव

 

नवगीत की सफलता केवल उसकी कथ्य-सम्पन्नता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसके छन्द-विधान, लयात्मकता, गेयता और शिल्प-संयम पर भी आधारित होती है। वस्तुतः नवगीत में कथ्य और शिल्प का संबंध परस्पर पूरक है; यदि कथ्य उसकी आत्मा हे तो छन्द और लय उसका प्राणतत्त्व हैं। अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' मूलतः छन्द-साधक कवि हैं। दोहा, कुण्डलिया, घनाक्षरी तथा अन्य पारम्परिक मात्रिक छन्दों पर उनकी सुदृढ़ पकड़ उनके नवगीतों में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। यही कारण है कि उनके गीत आधुनिक जीवनानुभवों और समकालीन यथार्थ को अभिव्यक्त करते हुए भी भारतीय गीत - परम्परा की मूल लय से विच्छिन्न नहीं होते।

 

उनके नवगीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनमें लय आरोपित नहीं लगती, बल्कि भाव के साथ स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होती है। छोटी-छोटी पंक्तियाँ, संतुलित चरण- विन्यास, ध्वन्यात्मकता तथा आवृत्ति का संयमित प्रयोग गीतों को सहज गेय बनाता है। उदाहरणार्थ-

 

साँझ के पैरों पड़ी हैं

बेड़ियाँ तम की नशीली।

चादरें तन ढाँकती हैं

मखमली सी और सीली।

सिगड़ियों की गर्म लपटें

लोरियाँ गाकर सुलाएँ।

(चल रही गूँगी हवाएँ, पृष्ठ 69)

 

इन पंक्तियों में चरणों की संतुलित गति, ध्वनि-सोन्दर्य तथा अन्तिम पंक्ति की पुनरावृत्ति गीत को विशिष्ट प्रभाव प्रदान करती है। शीर्षक-पंक्ति प्रत्येक अन्तरे के उपरान्त नए अर्थ - संदर्भ के साथ लोटती है और सम्पूर्ण रचना को एक सूत्र में आबद्ध कर देती है। यह आवृत्ति केवल गेयता का साधन नहीं, बल्कि सम्पूर्ण कथ्य का ध्रुवबिन्दु बन जाती है।

 

इसी प्रकार अनेक गीतों में टेक (मुखड़ा) सम्पूर्ण भाव-संरचना का केन्द्र बन जाती है। उदाहरण के लिए

कितनी तन्हाई है।

(पृष्ठ 57)

या-

सच्चाई का ढोंग करो,

पर सच मत बोलो।।

(पृष्ठ 59)

 

ये पंक्तियाँ केवल संगीतात्मक पुनरावृत्ति नहीं हैं, बल्कि प्रत्येक अन्तरे के अनुभव को समेटते हुए पाठक को मूल संवेदना तक पुनः ले आती हैं। इस प्रकार टेक यहाँ गीत की संरचनात्मक एकता तथा भावात्मक अन्विति दोनों को सुदृढ़ करती है।

 

इस संग्रह की एक महत्त्वपूर्ण शिल्पगत उपलब्धि पारम्परिक छन्दों, विशेषतः दोहा-छन्द, का नवगीत में सृजनात्मक प्रयोग है। कवि दोहे को स्वतंत्र रचना के रूप में प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उसे नवगीत की संरचना का कार्यशील अवयव बनाकर कथ्य को अधिक सघन, व्यंजक और प्रभावपूर्ण बनाता है। इस दृष्टि से दोहा यहाँ केवल छन्द नहीं, बल्कि वैचारिक निष्कर्ष, ध्रुवपद और भाव- संघनन का माध्यम बन जाता है।

 

इस संग्रह के 'जीवन की तसवीर', 'अच्छे दिन की आस', 'माँग रहा अधिकार' तथा 'विद्यार्थी॑ जैसे नवगीतों में दोहा - छन्द का अत्यन्त सृजनात्मक समावेश हुआ है। इसी प्रकार 'पैसा हुआ वसूल' नवगीत में मुखड़े तथा प्रत्येक समांत में दोहा-छन्द का कलात्मक प्रयोग उसकी लयात्मकता, गेयता और शिल्पगत सुदृढ़ता को विशिष्ट आयाम प्रदान करता है।

इन रचनाओं में दोहा केवल पारम्परिक छन्द के रूप में प्रयुक्त नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण नवगीत की संरचना, लय और वैचारिक संगठन का आधार बनकर उपस्थित होता है। दोहा-छन्द की संक्षिप्त, सघन और मारक अभिव्यक्ति इन नवगीतों के कथ्य को अतिरिक्त धार प्रदान करती है। सामाजिक यथार्थ, शिक्षा व्यवस्था की विसंगतियाँ, बेरोज़गारी, युवा वर्ग की आकांक्षाएँ तथा व्यवस्था विरोधी चेतना जैसे विषय दोहे की संक्षिप्त किन्तु प्रभावशाली अभिव्यक्ति में अधिक तीक्ष्ण होकर उभरते हैं। इस प्रकार दोहा यहाँ केवल छन्द-विधान का निर्वाह नहीं करता, बल्कि कथ्य के भाव- संघनन, वैचारिक निष्कर्ष तथा व्यंग्यात्मक प्रभाव का सशक्त माध्यम बन जाता है।

 

उदाहरणस्वरूप-

 

धनवर्षा से गाँव के,

सूख गये तालाब

शहरों के आने लगे

तब आँखों में ख़्वाब

 

फोर लेन सड़कें बनीं

दिल गाँवों का चीर

बदल गयी हर एक के

जीवन की तस्वीर

पास पुरुष के कार है

महिला के जेवर

(जीवन की तसवीर, पृष्ठ 143)

 

मुर्दे गड़े उखाड़ कर

करते हरदिन कोप।

अपनी करनी ढाँप कर,

द्वजों पर आरोप।

भोली जनता को कहाँ, आता है यह रास।

मृगतृष्णा ही रह गई, अच्छे दिन की आस।

(अच्छे दिन की आस, पृष्ठ 120 )

 

खुसफुस करते दिन कटें,

ठिठुर-ठिठुर कर रात।

कोई भी कहता नहीं,

अपने मन की बात ।

कैसे रोकें शीत का, अनचाहा विस्तार।

(माँग रहा अधिकार, पृष्ठ 116)

 

विद्यार्थी, पालक सभी, दिखे खूब लाचार

बिन शिक्षा के शुल्क जब, शाला गई डकार।।

(विद्यार्थी, पृष्ठ 91)

 

इन दोहों में शिक्षा के व्यवसायीकरण, बेरोज़गारी, बाज़ारवाद तथा युवा वर्ग की विडम्बनाओं को अत्यन्त संक्षिप्त किन्तु तीक्ष्ण अभिव्यक्ति मिली है। अन्तरों में विकसित कथ्य का सार इन दोहों में सिमटकर अधिक प्रभावशाली हो उठता है। यहाँ दोहा कथ्य का पुनरुक्ति-विधान नहीं, बल्कि उसका भाव-संघनित निष्कर्ष बनकर उपस्थित होता है।

 

इसी प्रकार 'पैसा हुआ वसूल' नवगीत में कवि ने दोहा-छन्द का अत्यन्त कलात्मक और योजनाबद्ध प्रयोग किया है। इस रचना के मुखड़े तथा प्रत्येक समांत में दोहा- छन्द का विन्यास है, जबकि मध्यवर्ती पंक्तियाँ गीतात्मक विस्तार प्रदान करती हैं। फलतः गीत में विस्तार और संघनन का एक अत्यन्त प्रभावशाली शिल्प विकसित होता है। मुखड़े के रूप में प्रयुक्त दोहा सम्पूर्ण रचना का ध्रुवपद बनकर बार-बार लोटता है और प्रत्येक अन्तरे के उपरान्त पाठक को मूल संवेदना तथा केंद्रीय विचार से पुनः जोड़ देता है। इस पुनरावृत्ति से गीत की लयात्मकता, गेयता और स्मरणीयता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। साथ ही, समांत में दोहा-छन्द का प्रयोग प्रत्येक अन्तरे को एक सारगर्भित निष्कर्ष प्रदान करता है, जिससे सम्पूर्ण रचना में संरचनात्मक एकता और वैचारिक सघनता बनी रहती है।

 

उदाहरणतः-

 

सिन्धोरे का मान गया, सन्तानों ने सहा कहर,

दग्ध चिताओं की चिनगी, छत पर आयी ठहर-ठहर,

दैनन्दिन सब हो गईं, खुशियाँ नष्ट समूल।

तू भी अब घर लौट जा, पैसा हुआ वसूल।।

(पैसा हुआ वसूल, पृष्ठ 61)

 

यहाँ दोहा सम्पूर्ण गीत का ध्रुवपद बनकर लौटता है। प्रत्येक अन्तरे के बाद उसकी पुनरावृत्ति पाठक को पुनः मूल संवेदना से जोड़ देती है। इस प्रकार गीत में भाव विस्तार और भाव- संघनन का अत्यन्त संतुलित विन्यास निर्मित होता है । यह शिल्प विधान नवगीत की गेयता को पुष्ट करता है तथा उसकी सम्प्रेषणीयता और स्मरणीयता दोनों को बढ़ाता है।

 

समालोचनात्मक दृष्टि से देखें तो अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' पारम्परिक छन्दों का केवल अनुकरण नहीं करते, बल्कि उनका कार्यात्मक पुनर्नृजन करते हैं। वे दोहा, गीतिका और अन्य मात्रिक छन्दों की अन्तर्निहित लय को आधुनिक नवगीत की संरचना में इस प्रकार रूपान्तरित करते हैं कि परम्परा और आधुनिकता के बीच एक सशक्त सर्जनात्मक संवाद स्थापित हो जाता है। उनके यहाँ छन्द किसी प्रकार का बन्धन नहीं, बल्कि कथ्य की अभिव्यक्ति का अनुशासित माध्यम है। इसीलिए उनकी रचनाओं में न तो छन्द की कृत्रिम कठोरता दिखाई देती है और न ही मुक्तछन्द की लयहीनता; बल्कि दोनों के बीच एक संतुलित और स्वाभाविक गीतात्मक प्रवाह विकसित होता है।

 

ध्वनि संरचना की दृष्टि से भी उनके गीत उल्लेखनीय हैं। अनुप्रास, अन्त्यानुप्रास, यति, गति तथा तुक योजना का ऐसा संतुलित संयोजन मिलता है कि गीत पढ़ते समय सहज ही गुनगुनाने की इच्छा होती है। यही गेयता नवगीत की मूल पहचान है और कवि उसे पूरी निष्ठा के साथ निभाते हैं।

 

उनके गीतों में संवादात्मक शैली का भी प्रभावी प्रयोग हुआ है। कहीं कवि स्वयं पाठक से संवाद करता है, कहीं प्रकृति मानवीकृत होकर बोलती है, तो कहीं सामाजिक परिस्थितियाँ ही प्रश्न बनकर पाठक के सम्मुख उपस्थित हो जाती हैं। यह शैलीगत विविधता संग्रह को एकरस होने से बचाती है और उसकी सम्प्रेषणीयता को समृद्ध करती है।

 

उल्लेखनीय यह भी है कि राजनीति, महँगाई, पर्यावरण संकट, सामाजिक विघटन, नैतिक अवमूल्यन तथा मानवीय संवेदना के क्षरण जैसे जटिल और समकालीन विषयों को भी कवि ने गीतात्मक लय बनाए रखते हुए प्रस्तुत किया है। अनेक बार सामाजिक व्यंग्य कविता को नारे में परिवर्तित कर देता है, किन्तु अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' के यहाँ व्यंग्य भी गीत की आत्मा में घुल-मिल जाता है; वह कथ्य पर आरोपित न होकर उसकी स्वाभाविक परिणति के रूप में उपस्थित होता है।

समग्रतः कहा जा सकता है कि 'चल रही गूँगी हवाएँ का शिल्प उसकी विषयवस्तु के अनुरूप संयत, अनुशासित, लयसम्पन्न और कलात्मक है। छन्द का दृढ़ आधार स्वाभाविक लय, स्मरणीय टेक, नियंत्रित तुक योजना, दोहा जैसे पारम्परिक छन्दों का नवगीत में सृजनात्मक समावेश तथा भाव और शिल्प का संतुलित सामंजस्य इस संग्रह को समकालीन नवगीत की शिल्पगत दृष्टि से विशिष्ट और उल्लेखनीय कृति सिद्ध करता है। यह संग्रह इस तथ्य का सशक्त प्रमाण है कि छन्द- साधना यदि सृजनात्मक संवेदना के साथ जुड़ जाए, तो परम्परा आधुनिकता की विरोधी नहीं, बल्कि उसकी सहचरी बन जाती है।

 

समग्र मूल्यांकन

 

अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' का नवगीत-संग्रह चल रही गूँगी हवाएँ समकालीन हिन्दी नवगीत की उन कृतियों में सम्मिलित है, जिनमें जीवन की बहुआयामी संवेदनाओं का सशक्त कलात्मक रूपान्तरण हुआ है। यह संग्रह किसी एक विषय या भावभूमि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समकालीन समाज की लगभग सभी प्रमुख समस्याओं राजनीतिक विडम्बना, सामाजिक विघटन, मानवीय संवेदनहीनता, पर्यावरणीय संकट, ग्रामीण जीवन की पीड़ा तथा सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण को अपनी रचनात्मक दृष्टि का विषय बनाता है। इस कारण यह संग्रह केवल साहित्यिक आस्वाद का माध्यम नहीं, बल्कि अपने समय के सामाजिक इतिहास का संवेदनात्मक दस्तावेज़ भी बन जाता है।

 

इस संग्रह का सबसे बड़ा गुण इसकी जीवन-सापेक्षता है। कवि कल्पनालोक में विचरण नहीं करता, बल्कि अपने समय की धूल, धूप, आँधी और संघर्षों के बीच खड़ा होकर गीत रचता है। उसके यहाँ व्यवस्था विरोध है, किन्तु कटुता नहीं; व्यंग्य है, किन्तु अशालीनता नहीं; करुणा है, किन्तु पलायन नहीं; और सबसे महत्त्वपूर्ण आक्रोश है, किन्तु उसके भीतर परिवर्तन की आस्था भी है।

 

संग्रह का एक बड़ा वैशिष्ट्य यह भी है कि इसमें लोक और समकाल का अत्यन्त संतुलित समन्वय दिखाई देता है। एक ओर महुआ, गौरैया, खेत, बाली, नदी और गाँव जैसे लोकजीवन के बिम्ब हैं, तो दूसरी ओर महँगाई, प्रदूषण, औद्योगिकीकरण, राजनीतिक छल और सामाजिक विघटन जैसी आधुनिक समस्याएँ । यही द्वंद्व संग्रह को व्यापक जीवनानुभव से जोड़ता है।

 

कवि की मानवीय दृष्टि का परिचय निम्न पंक्तियों में भी मिलता है- धैर्य अभी तक ज़िन्दा है / और सभी पर भारी है। यह छोटी-सी अभिव्यक्ति वस्तुतः पूरे संग्रह की जीवन-दृष्टि है। तमाम संकटों और विडम्बनाओं के बीच कवि मनुष्य की जिजीविषा पर विश्वास बनाए रखता है। यही विश्वास उसके नवगीतों को निराशा का आख्यान बनने से बचाता है।

 

इसी प्रकार संग्रह के अनेक गीतों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से यह आग्रह दिखाई देता है कि मनुष्य को अपनी संवेदना, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व को जीवित रखना होगा। कवि किसी वैचारिक घोषणापत्र का निर्माण नहीं करता, बल्कि गीत की सहजता के भीतर जीवन-मूल्यों की पुनर्स्थापना का आग्रह करता है।

 

शिल्पगत दृष्टि से भी यह संग्रह उल्लेखनीय है । छन्द, लय, गेयता, प्रतीक- विधान, लोकधर्मी भाषा तथा व्यंग्य की नियंत्रित शैली इन सभी का संतुलित समन्वय इसे कलात्मक ऊँचाई प्रदान करता है। विशेष रूप से यह तथ्य उल्लेखनीय है कि अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र समकालीन यथार्थ को अभिव्यक्त करते हुए भी गीत की आत्मा - रागात्मकता और लयात्मकता को कहीं भी खण्डित नहीं होने देते। यही गुण उन्हें अनेक समकालीन नवगीतकारों से अलग पहचान प्रदान करता है।

 

यदि आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो कुछ गीतों में राजनीतिक व्यंग्य की भावभूमि पुनरावृत्त होती हुई प्रतीत होती है, किन्तु यह पुनरावृत्ति भी विषय की सामाजिक व्यापकता के कारण स्वाभाविक लगती है। इसके बावजूद संग्रह की अधिकांश रचनाएँ अपने स्वतंत्र कथ्य, प्रभावी प्रतीकों और सघन संवेदना के कारण पाठक के मन पर स्थायी प्रभाव छोड़ती हैं।

 

समग्रतः चल रही गूँगी हवाएँ एक ऐसी कृति है जो समकालीन हिन्दी नवगीत की सामाजिक प्रतिबद्धता, लोकधर्मी चेतना और कलात्मक परिपक्कता का प्रतिनिधित्व करती है। अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' ने इस संग्रह के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि नवगीत आज भी समय के सबसे जटिल प्रश्नों को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करने में सक्षम है। उनके गीत केवल पढ़े नहीं जाते, बल्कि पाठक को सोचने, प्रश्न करने और अपने समय के प्रति अधिक संवेदनशील बनने के लिए प्रेरित करते हैं। यही किसी भी सार्थक साहित्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

 

समापन

 

समकालीन हिन्दी नवगीत की विकास-यात्रा में ऐसे रचनाकारों का विशेष महत्त्व है, जिन्होंने गीत की रागात्मकता को बनाए रखते हुए उसे समय के यथार्थ से जोड़ा है। अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' का नवगीत-संग्रह 'चल रही गूँगी हवाएँ इसी परम्परा की एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। यह संग्रह सिद्ध करता है कि नवगीत केवल भावुकता या प्रकृति-वर्णन की विधा नहीं है, बल्कि वह अपने समय के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रश्नों से सक्रिय संवाद करने वाली समर्थ काव्य-विधा भी है।

 

इस संग्रह में कवि ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की विडम्बनाओं, सामाजिक विषमता, पर्यावरणीय संकट, मानवीय संबंधों के विघटन, ग्रामीण जीवन की पीड़ा तथा बदलते सांस्कृतिक परिदृश्य को अत्यन्त संवेदनशीलता और कलात्मक संयम के साथ अभिव्यक्त किया है। इन विषयों का प्रस्तुतिकरण कहीं भी आरोपित या घोषणात्मक नहीं लगता, बल्कि जीवनानुभव की स्वाभाविक परिणति के रूप में सामने आता है। यही इस संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

 

संग्रह के शीर्षक में निहित प्रतीक सम्पूर्ण कृति का वैचारिक केन्द्र बन जाता है। यहाँ "गूँगी हवाएँ" केवल मौन प्रकृति का बिम्ब नहीं हैं, बल्कि उस समय का रूपक हैं जिसमें सत्य, संवेदना और प्रतिरोध के स्वर निरन्तर दबाए जा रहे हैं। यही प्रतीक संग्रह के अधिकांश नवगीतों में विभिन्न रूपों में विस्तार पाता है और सम्पूर्ण कृति को एक वैचारिक एकसूत्रता प्रदान करता है।

 

अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे समकालीन यथार्थ का चित्रण करते हुए भी निराशा के कवि नहीं बनते। उनके यहाँ प्रतिरोध है, परन्तु उसके साथ आशा भी है; व्यंग्य है, परन्तु उसके भीतर मानवीय करुणा भी है; सामाजिक आलोचना है, परन्तु उसके पीछे लोकमंगल की गहरी आकांक्षा भी विद्यमान है। इसलिए उनके नवगीत पाठक को केवल व्यवस्था के विरुद्ध नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर भी झाँकने के लिए प्रेरित करते हैं।

 

भाषा की सहजता, लोकजीवन से उपजे प्रतीक, छन्द और लय पर सुदृढ़ अधिकार, नियंत्रित व्यंग्य तथा प्रभावशाली बिम्ब-योजना इस संग्रह की कलात्मक उपलब्धियाँ हैं। विशेष रूप से यह उल्लेखनीय है कि कवि ने समकालीन जीवन जटिल प्रश्नों को भी गीत की मूल प्रकृति - राग, लय और गेयता को अक्षुण्ण रखते हुए अभिव्यक्त किया है। इस दृष्टि से यह संग्रह नवगीत की उस परम्परा का प्रतिनिधि है, जिसमें कला और सामाजिक प्रतिबद्धता परस्पर पूरक बनकर उपस्थित होती हैं।

 

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि ‘चल रही गूँगी हवाएँ' समकालीन हिन्दी नवगीत की एक सार्थक, विचारोत्तेजक और कलात्मक दृष्टि से परिपक्क कृति है। यह संग्रह अपने समय के यथार्थ का दस्तावेज़ होने के साथ-साथ मानवीय संवेदना और लोकचेतना का भी विश्वसनीय आख्यान है। अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र ने अपने नवगीतों के माध्यम से यह प्रमाणित किया है कि नवगीत आज भी भारतीय समाज की बदलती धड़कनों को सुनने, समझने और उन्हें कलात्मक अभिव्यक्ति देने में पूर्णतः सक्षम विधा है। इसी कारण चल रही गूँगी हवाएँ समकालीन नवगीत - साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण और स्मरणीय कृति के रूप में प्रतिष्ठित होती है।

 

समग्रतः अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' का योगदान इस अर्थ में महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने नवगीत को केवल भावप्रधान विधा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सामाजिक उत्तरदायित्व, लोकचेतना और समकालीन यथार्थ का प्रभावी माध्यम बनाया। चल रही गूँगी हवाएँ इस रचनात्मक दृष्टि का सशक्त प्रमाण है। यह संग्रह उन्हें समकालीन हिन्दी नवगीत के उन महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों की पंक्ति में प्रतिष्ठित करता है, जिन्होंने नवगीत को समय की चुनोतियों के बीच भी उसकी मूल गीतात्मक गरिमा, लोकधर्मी संवेदना और कलात्मक ऊँचाई के साथ आगे बढ़ाया है।

अन्ततः अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र' को उनके नवगीत-संग्रह ‘चल रही गूँगी हवाएँ' के लिए हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएँ। यह कृति न केवल उनके दीर्घ साहित्यिक अनुशीलन और छन्द-साधना का प्रमाण है, बल्कि समकालीन हिन्दी नवगीत की सृजनात्मक ऊर्जा का भी सशक्त उदाहरण है। आशा है कि उनकी लेखनी इसी प्रकार समय की धड़कनों को शब्द देती रहेगी, मानवीय मूल्यों, लोकचेतना और सांस्कृतिक संवेदना को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाती रहेगी तथा हिन्दी नवगीत - साहित्य को नई दिशाएँ और नए आयाम प्रदान करेगी।

 

ईश्वर से प्रार्थना है कि उन्हें उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, सतत सृजनशीलता और अक्षय साहित्य साधना का आशीर्वाद प्राप्त हो। उनकी रचनात्मक यात्रा निरन्तर प्रगतिशील रहे, उनकी लेखनी समाज में सत्य, संवेदना, सौन्दर्य और लोकमंगल के स्वर को और अधिक सशक्त बनाए तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और साहित्यिक संस्कार का स्थायी स्रोत सिद्ध हो।

 

साहित्य-साधना की यह अविराम यात्रा निरन्तर आलोकित रहे- इसी मंगलकामना के साथ।

 

समीक्षकीय कृति : चल रही गूँगी हवाएँ (नवगीत संग्रह)

रचनाकार         : अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र

प्रकाशक           : अक्षर विन्यास, उज्जैन (म. प्र.)

मूल्य                : रुपये 400/-

                                                                           'चंद्रप्रभा विला'

                                                                 417, रॉयल रेजीडेंसी- प्रथम फेस.

                                                                     सारंगपुरा, बड के बालाजी,                                   

                                                                    अजमेर रोड, जयपुर 302042

                                                                              संपर्क : 8209909309


एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने