और अन्त का आकलन, आँसू है निष्कर्ष।।
नये वर्ष की चाह में, युवा अधिक बेताब।
जैसे कोई आ रही, छपकर नयी किताब।।
आयेगी फिर गर्मियाँ, फिर होगी बरसात।
नये वर्ष फिर चाँदनी, चमका देगी रात।।उतरेगा नव वर्ष जब, सब होंगे खुशहाल।
क्या होगा यह स्वप्न सच, मन कर रहा सवाल।।
नया वर्ष देगा नये, भारत को आयाम।
रोटी सबको पेट भर, और सभी को काम।।बने नहीं इस वर्ष शिशु, घोर काल के ग्रास।
उन्हें न अब सहना पड़े , घोर प्रदूषण त्रास।।
न्यायपालिका में खड़े , कहते सरिता ताल।
कुदरत न्यायाधीश जी, हल देना इस साल।।
अब भी मन में जोश है, अब भी मन में चाह।
नया वर्ष सच की हमें , दिखलाएगा राह।।
वर्ग भेद मज़हब नहीं, अब होंगे दीवार।नया वर्ष की सीख है , करना सबसे प्यार।।
अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र'
